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Saturday, 21 January 2017

आदत aadat



आजकल अवाम ने  पढ़ने की आदत छोड़ सी दी है. सब बस भागमभाग भाग में लगे रहते हैं. कुछ पढ़ने के बजाय यू ट्युब पर देखने में ज़्यादा सहूलियत महसूस करते हैं. जबकि पढ़ने में जो लुत्फ़ होता है उसकी तो कुछ बात ही अलग है. ताज़ा-ताज़ा ख़बरों का मज़ा जो अख़बार पढ़ते हुए चाय-काफ़ी पीते हुए आता है उसकी तो बात ही निराली होती है. छोटी-छोटी कहानियां पढ़ना या बड़े-बड़े नॉवेल.कविताएँ पढ़ें या ग़ज़ल, हर बात का लुत्फ़ निराला हुआ करता था. किताबें पहले ज़माने के लोगों की सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थीं. सही रास्ता दिखाने में मददगार हुआ करती थी. अब तो मज़हबी किताबें भी डिज़िटल ही हो कर रह गईं हैं. हाँ ये भी सच ही है,कि हर एक बात का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, एक अलग अच्छाई होती है,तो एक कमी होती है,एक फ़ायदा होता है, तो एक नुकसान भी होता है यानि हर बात के दो पहलु होते हैं.  ऐसे ही हर पुराना ख़याल या पुराना दौर अच्छा ही हो  और हर नया  ख़याल और नया ज़माना  बुरा ही हो, ये भी सच नहीं. और फिर ये अपनी-अपनी पसंद अपना-अपना ज़ायका है. जिसे जो अच्छा लगता है अपना लेता है. अब भी ऐसे पढ़ने के शोक़ीन मौजूद हैं,दुनिया में,जिन्हें पढना-पढ़ाना अब भी ख़ासा पसंद होता है.

शहर नहीं,गाँव भी अच्छे होते हैं
शहरों में भी लोग सच्चे होते हैं
कहीं हों, अच्छे लोग अच्छे होते

बुढ़ापे में बचपन अच्छे लगते हैं       
कुछ सयाने  भी  बच्चे लगते हैं

पुख़ता दीवारों के घर कच्चे देखे
कच्चे घरों के बाशिंदों में रिश्ते पक्के देखे

रेशमी लिबास में पत्थर-दिल देखे
साये में अमीर बस्ती के भूखे बच्चे देखे

कल की फ़िक्र में आज को खोते सारे देखे
अभी की परवाह नहीं,दूरअंदेश सारे देखे

ख़िजां के बाद बहारों के गुल अच्छे लगते
मुश्किल वक़्त में सब्र के फ़ल मीठे लगते


आज की जनरेशन के पास वक़्त नहीं है, किताब पढ़ने का. इन लोगों को ये काम मुश्किलतरीन लगता है. इतना बड़ा आर्टिकल? इतना बड़ा ख़त? इतनी बड़ी बुक? ऐसे रिएक्शन होते हैं. अब ये आदत ही कहाँ? कहीं कुछ लिख कर रख लो याददाश्त के लिए. कुछ पुराना याद आये तो निकल कर पढ़ लो. एक मशीनी ज़माना आया है. मोबाईल में नोट कर लो और डिलिट कर दो. मोबाइल से भी और अपनी याददाश्त से भी. ख़त-ओ-किताबत की तो बात ही ना जाने कहाँ पीछे छूट गई है.एक फ़ॉर्मल सा मेल होता है. और वो भी ज़रूरी लगे तब,वरना तो बस, कुछ जुमलों वाला मेसेज ही काफ़ी होता है.

Sunday, 19 June 2016

परिंदेparinde


इस दुनिया में ज़्यादातर यही नज़र आता है कि आप और हम अक्सर अपने बच्चों के मुस्तक़बिल को ले कर परेशान तो होते ही हैं साथ-साथ उसे अपने मुताबिक़ बनाने में भी जुट जाते हैं. ये हम एक चूक कर डालते हैं.होना तो ये चाहिए कि हम उन्हें अच्छी तरबियत दे कर उन्हें अच्छी शख्सियत का मालिक बनाएँ,और अपने मुस्तक़बिल को वे ख़ुद बनाएँ. सारे के सारे बस अपने ख़्वाब अपने बच्चों के ज़रिये पुरे करना चाहते हैं.जो ग़लत तो है ही,पर बगैर अच्छे क़िरदार के तो ये सरासर बेबुनियाद क़दम है.और जब बुनियाद ही नहीं सही तो इमारत के ना तो महफ़ूज़ होने की और ना बुलंद होने की ग्यारंटी होती है.धृतराष्ट्र और शकुनी ने ख़्वाब तो देखा और कोशिश भी की. दुर्योधन को बादशाह बनाने की,लेकिन उसकी शख्सियत बुलंद बनाने की कोई कोशिश उन्होंने नहीं की. नतीजा सबके सामने है. उन्होंने मुस्तक़बिल बेहतर बनाना चाहा और ऐसी कोशिश भी की,लेकिन किरदार बेहतर बनाने की तरफ़ देखा भी नहीं. सही कहा गया है “ बच्चों की शख्सियत आप बनाइये अच्छी. अपना मुस्तक़बिल वो ख़ुद अच्छा बना लेंगे”.अब ज़मीन को ही देख लीजिये,अपने पानी को गर्म होना,ठंडा होना ये सिखा देती है,फिर  बादल बनकर बारिश करना या बर्फ़ की फ़ुहार करना ये ख़ुद तय करते हैं.


इस तरह परेशां क्यों है बन्दे
ना बांध ख्वाइशों में पर परिंदे

आसमानों में बसर करने वाले
वफ़ा की ज़मीन कभी परख ले

दुआओं को अपने तक ना रख
लबों पर औरों के मुस्कान रख
सबकी  दुआओं का मज़ा चख़

बेफ़िक्र बच्चों सा दिल बना अपना
चराग़ बना ख़ुद को अँधेरे कर फ़ना

Thursday, 26 May 2016

fitrat meri फ़ितरत मेरी



बोहोत से लोगों की ये आदत सी बन जाती है कि वो अपने ख़याल ज़ाहिर नहीं कर पाते. चाहे वो किसी की किसी बात से ख़ुश हों या नाख़ुश. ये दबे हुए ख़यालात धीरे-धीरे नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाते हैं,मुख़ालफ़त धीरे से अपनी जगह बनाने लगती है. कई बार लोग अपनी मुख़्तलिफ राय दबा कर रख तो लेते हैं,पर ये दबी  हुई बातें,एक हमलावर की तरह का, अदावत का जज़्बा बन कर रहने लगती हैं इन्सान के साथ. इससे बेचैनी बढ़ती है,और ये बेचैनी नाराज़गी और नाउम्मीदी को पैदा करती है. नतीजा ये होता है कि इन्सान की ताक़त कम होती जाती है,जिस्मानी भी और दिमाग़ी भी. इसका असर क़ाबलियत पर भी पड़ता है और क़ामयाबी पर भी. इसलिए अपने ख़यालात,अपनी राय, कुछ भी दबा कर ना तो ख़ुद ने रखना चाहिए और अपने दोस्तों को,अपने रिश्तेदारों को भी इस बात को बताना और सिखाना चाहिए कि वो अपने ख़यालात खुलकर सामने लायें. अक्सर दूरियाँ भी इसकी वजह बन जाती हैं. कभी दूरियों की वजह से ग़लतफ़हमियाँ भी पैदा हो जाती हैं. इसलिए सबसे मिलते मिलाते रहना चाहिए. मुलाक़ात के मौक़े बढेंगे तो बातें भी होंगीं और ग़लतफ़हमियाँ भी दूर होंगी. शिक़ायतें भी दूर हो जाएँगी.

ग़म हो कोई या मुश्किल आए
ख्वाइश कभी लब तक ना आए

ख़्वाब कोई या अरमान  जागे
दिल ही दिल  बुनते रहे धागे

लिख देना सब आदत है मेरी
कहना क्यों नहीं फ़ितरत मेरी

ख़ामोश ज़ुबां होती नागवार
रोते हैं अरमा जब ज़ार-ज़ार

कोई करता जब वार पर वार
कहाँ चली जाती  ये तलवार

होती तवक्को जो इनकी ख़ास
तब मिलते नहीं क्यों अल्फ़ाज़


Wednesday, 11 May 2016

khamoshiख़ामोशी



इंसान जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है,कुछ-ना कुछ नया सीखता जाता है. उसके कई ख़यालात भी बदलते जाते हैं. पहले वो ज़माने को अपने जैसा बनाना चाहता था,थोड़े वक़्त के बाद ज़माने जैसा बनने की कौशिश करने लगता है. कोई साथी हो तो उसके जैसा बन कर उसके साथ रहना चाहता है. लेकिन ये भी कोई सही फ़ैसला नहीं होता. उसे धीरे-धीरे ये समझ में आ जाता है कि किसी की नक़ल करने से बड़ी बेवकूफ़ी कोई और नहीं होती. हु-ब-हु किसी जैसा बन कर नहीं जिया जा सकता सुकून के साथ.जब उसकी ज़िन्दगी में हमसफ़र की आमद होती है तब,चाहता है कि जो उसे पसंद है साथी की भी वही पसंद हो और उसकी ख़ातिर उसका साथी अपनी आदते भी बदल डाले. और ये बिलकुल भी  सही बात नहीं होती है,कि अपने साथी की आदतें, उसकी पसंद-नापसंद को बदला जाये. ऐसा हरगिज़ भी सही नहीं है कि बदल कर ही वो आपका सच्चा साथी बन सकता है. वो जैसा भी है अपनी एक अलग शख़सियत रखता है. उसे आप दिल से अपनाएंगे तभी सही मायने में आप एक अच्छे और सच्चे हमसफ़र साबित होंगे.

सुनता रहता है दिल ख़ामोशी से
बातें जो तुमने कही सरगोशी से
चुप रहना फ़ितरत इसकी  सही
कहते रहना आदत तुम्हारी रही

सौ-सौ शिक़ायतें सारी  सुनी मैंने
नही की कभी बातें अनसुनी मैंने
ख़ामोशी याने के ना सुनना नहीं  

ख़ामोशियाँ मेरी भी कहती  रहीं
आवाज़ दी नहीं,बुलाया ना कभी

चाहा यही लेकिन हरदम मैंने भी
सुनलो सदाएँ मेरी  हमदम कभी
इल्तजा ख़ामोशी मेरी करती रही

Friday, 22 April 2016

apne liyeअपने लिए



दुनिया में हम सारे ज़माने के साथ बेहतरीन से बेहतरीन रिश्ते बनाते हैं और उन्हें निभाते भी बड़ी शिद्दत के साथ हैं. हम भूल जाते हैं तो बस एक बात कि हमें भी ख़ुद की ज़रूरत होती है. एक रिश्ता ख़ुद से ख़ुद का भी ज़रूरी है. दूसरों के लिए,उनकी जरूरतों के लिए आपकी मौजूदगी बहोत अच्छी बात है. थोड़ा सा वक़्त अपने आप के लिए भी होना चाहिए,ख़ुद के पास. ये एहसास आपको ज़िन्दगी से भरपूर होने का एहसास दिलाएगा,एक सुकून से सराबोर करेगा कि आप,आप हैं. सबकी ख्वाइशें पूरी करें,सबकी फ़रमाइशें पूरी करें,बस इस सबकी फ़ेहरिस्त में ख़ुद को भी शामिल कर लें. ज़रूर दूसरों की आपके बारे में राय  सुने, पर उनके नज़रिये से ख़ुद को ना देखें.ख़ुद को शाबाशी देना सीखें. अपने लिए ख़ुद फ़ैसले लें ना कि बग़ेर सोचे समझे दूसरों के फैसलों पर अमल कर डालें. ख़ुद के लिए जीना सीखें. अपने शौक़, अपनी पसंद और उन बातों का जो आपके लिए एहमियत रखती हैं,उनका भी ख़याल रखें. जब आपका अपने आप से इतना प्यारा रिश्ता बन जायेगा,कि आपकी ख़ुशी, आपके ग़म, आपकी ज़रूरत के वक़्त आप ख़ुद के क़रीब मौजूद रहते हैं तब आप सुकून तो पाएँगे ही अपने अन्दर ज़िदगी जीने की एक नई ताक़त महसूस करेंगे.और तब आपकी ज़िन्दगी की ख़ुशहाली का आप ज़रा तसव्वुर तो कर के देखिये.बस पहला क़दम उठाइए और मज़बूती से उस पर क़ायम रहिये.


इरादे हों मजबूत,नज़ाक़त की क्या बात

ताक़त हो फ़ौलादी,नज़ाक़त की क्या बात

आसां नहीं मंज़िल,नाज़ुक हो गर मिजाज़

नाज़ुकमिजाज़ी में गुम हुए  सारे नवाब

नसीहत है नज़ाक़त से अपनी कहो बात

कहते वही सच हो, पुख़्ता हो जो बात

क्यों चुनने बैठें फिर नाज़ुक  अल्फ़ाज़


Wednesday, 13 April 2016

ख़्वाबkhwab


हमें ख़्वाब ज़रूर देखना चाहिए,क्योंकि जब तक ख़्वाब को देखा नहीं जायेगा ,तब तक उन्हें पूरा करने की ख़्वाइश दिल में पैदा नहीं होगी,और उन्हें पूरा करने की कोशिश की ही नहीं जा सकेगी. ख़्वाब जो हक़ीकत का जामा पहन सकते हैं. रातों की नींदों के नहीं,खुली आँखों से देखे जाएँ तभी वो इन्सान को एक उम्मीद से भरी दुनिया की सैर कराते हैं. उनमे एक ऐसा जादू होता है,जो एक ताक़त ज़िंदगी जीने की तो देते ही हैं.ज़िन्दगी को मक़सद भी देते हैं. ऐसे ख़्वाब आपकी नींदों को उड़ाने की क़ुव्वत भी रखते हैं.

हाँ ये ज़रूर याद रखना चाहिए कि हर ख़्वाब को पूरा करने की जब तक कोशिश नहीं की जाएगी, उसका मुक़म्मल होना नामुमकिन सी बात है. वक़्त और मेहनत ज़रूर लगेगी, लेकिन ख़्वाब पूरा ज़रूर होगा. अगर एक कोशिश काम नहीं कर पाई,तो वजह क्या रही उसे पह्चाने,और फिर सुधार के साथ नई शुरुआत करें.

हाँ ख़्वाब जब तक आपको ख़ुशी और इत्मीनान और सुकून नहीं दें उन्हें आप जी जान से जी नहीं पाएँगे. जो लोग अपनी ज़िन्दगी को ख़्वाब मानते हैं,ऐसा कहते हैं कि वो सही ही होते हैं,क्योंकि कहते हैं हम जागते हुए सोते हैं,और सोते हुए जागते हैं.

आवाज़ दे कर उन्हें ज़िन्दगी दो
ख़्वाब गुज़रते हैं ख़यालों में जो
रात या दिन उन्हें सोने ना दो
जागी आँखों में जागे ख़्वाब जो
मक़सद के साथ उन्हें मंज़ूरी दो
भटकते हैं ख़याल बेमक़सद जो

मंज़िल आसां समझने की भूल ना हो
मौत-हयात की इन्हें कश्मकश ना दो

तवक्को चाहें सारी तुम्हारे ख़्वाब
सोने ना दें जो सीने की बन आग
ढूँढती उन्हें मंज़िल दीवानी हो
धूल  बन  जाते  राहों की जो


Tuesday, 1 March 2016

पसंद नापसंदpasand napasand



समझदार इंसान कौन होता है? क्या वो जो अपनी पसंद का ही देखना चाहता है? जो उसे पसंद नहीं, नज़र नहीं आता. या वो जो सब कुछ देखता है,चाहे उसे नापसंद हो,उसमे उसका फ़ायदा हो या नुक़सान.ये बात उसके लिए माएने नहीं रखती हो. अक्सर जिन बातों की हमें जानकारी नहीं होती या बहोत कम होती है,उन्ही पर हम सबसे ज़्यादा यक़ीन करते हैं.तो सही क्या हुआ? सब कुछ मालूम होना ना! फ़िर अपनी ही पसंद को देखने वाला समझदार क्यों माना जाता है? जबकि ये भी कहते हैं,तालीम ना हो तो ज़िन्दगी आधी-अधूरी रहती है.पर तालीम के बग़ैर भीतो लोग सुकून और आराम की ज़िन्दगी बिता ही लेते हैं.तलाश किस चीज़ की है ये जाने बग़ैर कैसे मंज़िल तक पंहुचा जा सकता है? कई बार ज़िन्दगी में वो खौफ़नाक वाकिये हुए ही नहीं होते हैंजो ज़हन में मौजूद रह कर सबको डराते रहते हैं.इस अनदेखे अंजाने दर के साथ लोग आगे बढते जाते हैं. कुछ चीज़ों से बचते और दूर भागते हुए कैसे? कहते हैं एक समझदार इंसान ख़ुद को जनता है,तो ज़िन्दगी में कुछ खो नहीं सकता.यानी यह ज़हन ही है जो आपको अच्छा या बुरा,ग़म या ख़ुशी दिखता है.अमीर या ग़रीब बनाता है.

ग़म मेरा पाश-पाश है,
अश्क़ क़तरा-क़तरा हुए जाते हैं

वो है हमदर्द मेरे यहाँ
जो दर्द पर दर्द दिए जाते हैं

आरज़ू दिल की दिल में
अरमान काश-काश किये जाते हैं

जो बाँटते रहे ख़ुशियाँ
आज ग़म की तलाश किये जाते हैं

आईना बन गए अश्क़
सारे राज़ अब तो फ़ाश किये जाते हैं

ये ज़बाने-ख़ल्क़ है
रोशनी को ज़ुल्मत-परस्त किये जाते हैं

बात फ़क़ीर-दरवेश की नहीं
ज़माने में सब  राहत-परस्त हुए जाते हैं



Sunday, 10 January 2016

jlavatanजलावतन



दुनिया में आने वाला हर शख़्स एक ना एक दिन मरता ज़रूर है,पर हर शख़्स जीता भी कहाँ है?यानि एहमियत इस बात की नहीं,कि ज़िन्दगी जीने के बाद आप कहाँ जाएंगे?जन्नत मिलती है आपको या दोज़ख़ मिलती है. असल और ज़रूरी सवाल ये होना चाहिए कि आपने इस ज़िन्दगी को कैसे जिया? खुशियों को अपना कर जन्नत की तरह लुत्फ़ उठाया या ग़मों के साग़र में गोतें लगा कर अपनी ज़िन्दगी को जहन्नुम बना लिया. हमेशा शक़,डर,नफ़रत या गुस्से में रहने वाले के लिए खुशियाँ ना तो इस जहाँ में होती हैं और ना उसे ये कहीं और मिलती हैं. अपने किसी काम को करने से पहले ये ना सोचें,कि आप अकेले हैं, चाहे आप सब नहीं कर सकते हों,पर कुछ तो होगा जो आप कर सकते हों,तो फ़िर अपने क़दमों को बढ़ने से नहीं रोकना चाहिए. बात जो आपके बस के बाहर की हो जिसके होने या ना होने पर आपका कोई अख़्तियार नहीं होता,आप अगर हर उस बात की फ़िक्र छोड़ दें,तो समझ लीजिये आपको हमेशा ख़ुश रहने का रास्ता मिल गया.
शिक़ायतें चलती रहती हैं. साथ-साथ इनके ज़िन्दगी भी चलती रहती हैं. अब ख़ुश होकर जियें या शिक़वा कर-कर के जियें.जीना तो है ही,तो क्यों ना ख़ुश हो कर ही जिया जाये.एक फ़ारसी कहावत है कि,ज़िन्दगी में गुलाब चाहते हो तो काँटों की इज़्ज़त करना सीखो.यानि ये जान लेना ज़रूरी है कितना छोटा सा भी टुकड़ा हो उसके सिरे दो ही होते हैं. किसी बात के पहलु भी दो ही होते हैं,तो ख़याल भी दो ही होंगे.अब आप किसे अपनाते हैं?

मेरे एतेक़ाफ़ को   जलावतन बना दिया
वक़्त ने किस बात का कैसा सिला दिया

हर-एक का अपना-अपना ज़ख्म हैं यहाँ
सबने अपनी आग़ में ख़ुद को जला दिया

रूह भटकती है अपने ही जिस्मों में
इंसान को ये कैसा खँडहर बना दिया

सफ़ेद ख़ून भी जहाँ ने किया बर्दाश्त
तूने आदम को आदमख़ोर बना दिया


आँधियों में चरागों ने फ़िर भी रखा दम
ये क्या अंधेरों ने उजालों को जला दिया

Sunday, 3 January 2016

mere dar tak मेरे दर तक



अक्सर जज़्बाती इंसान को लोग कमज़ोर  समझने की भूल करते हैं.लेकिन सच्चाई ये नहीं है. सच तो ये हैं कि जज्बाती इंसान हमेशा ही मज़बूत होते हैं. उनका ज़िन्दगी को,दुनिया को और लोगों को देखने समझने का नज़रिया आम लोगों से ज़रा मुख़्तलीफ़ सा होता है. जो कमियाँ, जो कमज़ोरियाँ आम लोगों में होती हैं, वही इनमे भी हो सकती हैं. और इसी तरह जो खूबियाँ सब में हो सकती हैं वही इनमे भी होती हैं अक्सर तो खूबियाँ आम लोगों से बढ़ चढ़ कर होती हैं और दूसरों की खूबियों को पहचानने का एक अलग सा हुनर भी इनमे पाया जाता है.ये दुनिया से अपनी किसी मुश्किल के वक़्त मदद के इंतेज़ार में बैठे नहीं रहते. ख़ुद ही मुश्किलों से बहार आने की कोशिश करते हैं,और जीतते भी हैं. ये दोस्ती एक दम से नहीं करते लेकिन जब कर लेते हैं तो पूरी शिद्दत से उसे निभाते हैं. दोस्ती ही क्या ये हर रिश्ता पूरी ईमानदारी से निभाते हैं. अक्सर किसी का फ़रेब इन्हें तोड़ देता है क्योंकि ये इनकी नाज़ुकमिजाज़ी  होती है. जिस तरह ये किसी के लिए बा-वफ़ा होते हैं, किसी की बेवफ़ाई और फरेब इन्हें तोड़ देते हैं. पर इस मोड़ से गुज़र कर ये और भी मजबूत हो जाते हैं .ये क्या हर इंसान ऐसे हालात से दो-चार होने के बाद सबक़ सीख कर मज़बूत हो कर ही आगे बढ़ता है. थोड़ी सी नाउम्मीदी होती है, पर ये भी थोड़ी सी देर की ही होती है.    


सूरज आज बड़ी देर से आया मेरे दर तक
आशियाँ अँधेरे से जलता रहा बड़ी देर तक
उम्मीद के चराग़ फ़िर जलाए बड़ी देर तक
सूरज आज बड़ी देर से आया मेरे दर तक
मेरी रात खड़ी रही दिन के द्वार देर तक
उजाला बाँटता रहा सबको ये दूर-दूर तक
दफ़न करता रहा अंधेरों को ये  देर तक
तेरे सारे अंदाज़ ठीक हैं,पसंद हैं,ऐ! सूरज
क्यों छीना तूने मेरी चांदनी को ऐ!सूरज
चांदनी मेरी लौटा दे चाहे फ़िर ना आना तू
सौग़ात मेरी लौटा,जहाँ जी चाहे फ़िर जा तू
तू आज मेरे दर, बड़ी देर से आया है सूरज
अपने साथ ये जलन-तपन लाया है ऐ!सूरज


Thursday, 31 December 2015

nai subah नई सुबह


एक पुराना पल जाता है एक नया पल आता है. ले कर आ जाता है एक नई सुबह. नई ताजगी नया जोश. ये  नए साल की शुरुआत की अदा होती है . एक साल खत्म होता हो एक शुरू होता है. पल भर में मंज़र बदल जाता है. वक्त गुज़र जाता है. एक साल और जुड़ जाता है वक़्त के समंदर में. जो बीत रहा पल है वो भी,ढेर सारी यादों के साथ विदा लेता है ,जो आ रहा है वो भी कई नई यादों की  ज़मी तय्यार कर रहा होता है. कुछ फ़हरिस्त बन रही होती हैं. कुछ ख़्वाब जाग रहे होते है. कुछ ख़्वाइशे पैदा हो रही होती हैं.  कुछ नया सा ज़िन्दगी का आसमान लगने लगता है. कुछ बदलाव होगा ज़िन्दगी में कुछ वही पुराना रहेगा साथ में. सभी को ख़ुशदिली से अपना लो. ख़ुशी भी है इस बदलाव में . मुस्कान भी है शामिल इसमें. ख़ामोशी भी है, इसी में आवाज़ भी है शामिल इसमें. और हर एक का अपना एक अलग ही सुकून और इत्मीनान होता है. असली ख़ुशी असली सुख यही तो है.

लम्हा नया आता अब लम्हा-लम्हा थमकर
देखें उजाला ये नया लेकर आता या नहीं

जब मिली ख़ुशी,बेतहाशा हँसते रहे हम
यूँ क़तरा-क़तरा हँसना हमें आता नहीं

राहगुज़र अपनी संवारना है ख़ुद सबको
हर मुश्किल में बचाने मसीहा आता नहीं


गुल नए रंगों-बू में रोज़-रोज़ खिलते रहेंगे
चुन-चुन टूटने से इन्हें बचना आता नहीं

हर दिन एक नई क़यामत होती है यहाँ
ख़ुशी फिर भी नए बरस की जाती नहीं

तेरे ज़िन्दा होने की निशानी है जहाँ में
मुस्कुराने की वजह बेहतर इससे  नहीं

मत घबरा देख काले-काले साए  यहाँ
कहती छाया ,रौशनी मुझसे दूर नहीं

Tuesday, 29 December 2015

seekh sako toसीख सको तो



इंसान की ज़िन्दगी में दुःख, परेशानी साथ साथ चलते ही रहते हैं. ऐसा लम्हा शायद कभी नहीं आता,जब सारी परेशानियाँ ख़त्म हो जाएँ. कुछ ना कुछ तकलीफ़, परेशानी तो होती ही है. लेकिन ऐसा भी नहीं होता कि साथ इसके कोई ख़ुशी ना हो ज़िन्दगी में. वो भी रहती ही है किसी ना किसी रूप में हमारे आपके साथ. इसीलिए ज़िन्दगी के ख़ुशनुमा पलों को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए. उन्हें पहचान कर उनका लुत्फ़ उठाते रहना चाहिए. ऐसा नहीं कि सिर्फ़ मुश्किलों और परेशानियों के पीछे ही अपनी ज़िन्दगी मुहाल कर देना चाहिए. क्योंकि कुछ परेशानियाँ तो ख़ुद-ब-ख़ुद ही ख़त्म हो जाती हैं. कुछ थोड़ी बोहोत कोशिश से दूर हो जाती हैं,चाहे जल्दी या चाहे थोड़ा वक़्त ले कर, पर दूर हो जाती हैं. कुछ नई नई भी, साथ-साथ पनपती रहती हैं. इसलिए ज़िन्दगी के मज़े लेते रहना चाहिए. यही तो ज़िन्दगी है. असली ख़ुशी आपकी सोचों में होती है. आप किस बात को किस नज़रिए से देखते हैं.ये ख़ास मायने रखता है. ख़ुशी चाहिए तो उसे पहचानो भी,ख़ुश रहना भी सीखो.कभी ख़ुद से सीखो ,कभी दूसरों को देख कर सीखो.


बादलों की तरह बरसना क्या होता है
हमें देख कर समझ सको तो समझो

बिजली की तरह तड़पना क्या होता है
तड़प देख हमारी जान सको तो जानो

आँखों-आँखों में आंसू पीना क्या होता है
पढ़ सको तो दर्द की ख़ामोशी पढ़ लो

ज़ख्म सीते हैं सभी अपने इस जहाँ में
चाक जिगर सीना देख हमें  सीख लो

देख क़ातिल उतर आता, लहू नज़र में
मुस्कुराती नज़रों का क़हर अब देख लो

हमें था पता बेवफ़ाई तेरी फ़ितरत में है
तक़दीर अपनी ख़ुद बिगाड़ना यूँ देख लो

पशेमानी सबसे जाताना आसां नहीं होता
झूठ को सच बताना देख उन्हें सीख लो  

Saturday, 26 December 2015

ye zindagiये ज़िन्दगी



यूँ तो लिख देना, कह देना शायद आसान होता है, लेकिन उस पर ख़ुद अमल करना मुश्किल होता है. क़ामयाब वो नहीं होता जो अभी आपको बुलंदी पर नज़र आ रहा होता है.असल में जिसने पहले नाक़ामी पर जीत हासिल की होती है वही आज क़ामयाब होता है. जैसे  कहा गया है कि बहादुर वो नहीं होता जिसे डर नहीं लगता ,बल्कि बहादुर वो है जो डर पर जीत हासिल कर लेता है. इसी तरह क़ामयाबी का होता है. पिछली आपकी हार या आपकी जीत उससे  आपके हौसलों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने देना चाहिए. पिछला सब भूल कर अभी यानि इस वक़्त जब आगे बढ़ रहा हो तब अपनी सबसे बहतरीन ताक़त का इस्तेमाल करे.  दुनिया में सभी दर्द के, नाक़ामी के, तकलीफ़ के कभी ना कभी शिकार होते ही हैं.ग़लतियाँ भी सभी से कभी ना कभी होती ही हैं. अक्सर इन लम्हों में आपके अपने काफ़ी मददगार साबित होते हैं.दुःख,तकलीफ़ या परेशानी को लिख कर भी आप एक नई रौशनी पा सकते हैं. नया रास्ता ढूंढ सकते हैं. हाँ अपने दर्द, अपनी तकलीफ़ या अपनी हार को, अपना औज़ार बनाएँ,अपनी ताक़त बनाएँ ना कि अपनी कमज़ोरी.


खामोशियाँ मेरी चीख़ती हैं
आवाज़ों को मिले ना अल्फ़ाज़ जब
गुमसुम से सन्नाटे रोते हैं
दिल में हों आँसू,हँसी चेहरे पर जब
ज़िंदगी के गीतसिसकते हैं
क़िस्मत की क़लम टूट जाती जब
हौसला मेरा लहुलुहान होता है
मिलकर मंज़िल खो जाती जब
ज़िंदगी झूठ पर मुस्कुराती है
हक़ीक़त से प्याले लबरेज़ हो जब
ज़िद्दी परिंदा उड़ जाना चाहे

सारी उम्र लिखा जो ख़त,खो जाए जब

Thursday, 24 December 2015

usul zindagi keउसूल ज़िन्दगी के



इंसान हमेशा हर पहलु को ज़िन्दगी के अपनी मुट्ठी में रखना चाहता
है पर हर बात उसके क़ाबू में नहीं हो सकती. ऐसा कहाँ होता है कि जब जैसा चाहो वैसा ही नतीजा निकले हर बात का. हाँ हम किसी और को तो नहीं अपने आप को बेहतर तरीक़े से क़ाबू कर सकते हैं. कोई मुश्किल आ जाए अगर तो किसी मदद के इंतेज़ार में बैठने से बेहतर है ख़ुद ख़राब हालात को बदलने की शुरुआत करें.मुश्किल को समझें. उसे सुलझाने की कोशिश करें. क़ामयाब ज़रूर होंगे. और क़ामयाबी क्या होती है ? आप और हम कुछ आसान से उसूल
अपना कर रोज़ उन पर एहतियात के साथ चलना सीख लें,तो क़ामयाबी कहाँ जाएगी आपके क़दमो तले ही रहेगी. किसी और से मत उम्मीद रखो किसी और से मत कुछ मांगों,और किसी और को नहीं, अपने आप पर क़ाबू रखना सीखो. ज़िन्दगी ख़ुशहाल जीने के तरीक़े यही हैं.

उम्मीदों ज़रा थमना सीखो
ख़्वाइशों ज़रा संभलना सीखो
बादलों से वफ़ा ना मांगों
हवा से ये तो उड़ते रहते हैं
मौसमों के साथ ये बदलते हैं
ज़मी की मिटटी देती पनाह
ख़्वाईशों ने जो बाँधा बंधन
है ज़िद किए बैठा ये दिल  
ख़्वाब सजाए जो अरमानों ने
लगी उगने नन्ही-नन्ही उम्मीदें
क्या ज़मी की,क्या आसमा की
फ़ितरत किसकी होती वफ़ा की
ज़िद पर दिल की,बेक़ाबू होना ना
चाहे किसी को कितना भी चाहो
किसी पर ऐतबार चाहे कर लो
ख़ुद का ऐतबार खोने ना देना
पहले परखने से फ़ितरत-ऐ-ज़मी 
जज़्बात दिल को बोने ना देना
उम्मीदों ज़रा थमना सीखो












Wednesday, 23 December 2015

mera haq मेरा हक़



यूँ तो इस दुनिया में अक्सर किसी और की ज़िन्दगी में दख़ल का हक़ सा समझते हैं लोग. जबकि आपकी ज़िन्दगी पर सिर्फ़ आपका हक होता है. सारे फ़ैसले आपके होते हैं. सारे ख़्वाब आपके होते हैं. ना तो किसी और ने उन्हें अपने हिसाब से तय करना चाहिये और ना आपको कोई बहाना या सफ़ाई पैश करने की ज़रूरत है कि कोई फ़ैसला या कोई काम  आपने क्यों किया या क्यों करना है. वजह आपको मालूम है ,बस! यही काफ़ी है. आप पर आपका हक़ है. आपके वक़्त पर आपका हक़ है. आपके ख़्वाबों पर आपका हक़ है. आपकी ज़िन्दगी पर आपका हक़ है. कोई और कोई हक़ नहीं रखता कि आपके वक़्त को बर्बाद करे. आपकी इज्ज़त जो आप ख़ुद को देते हैं वो आपसे ले, या चाहे की उसे दी जाये, वो कोई भी हो इस बात का क़तई हक़दार नहीं होता. आप किससे प्यार करें, किससे मोहब्बत ना करें,किसकी इबादत करें. इस फ़ैसले पर भी सिर्फ़ आपका हक़ होता है. ना तो इस बात के लिए किसी की इजाज़त की ज़रूरत है और ना किसी को वजह बताने की ज़रूरत है.
अपनी ज़िन्दगी अपने तरीक़े से जीना आपका पहला हक़ है,ख़ुद के लिए,ख़ुद का एक फ़र्ज़ है. उसे दूसरों के हिसाब से दूसरों की ख़ुदग़रज़ी की ख़ातिर ना छोड़ें.
ज़िन्दगी ख़ुशग़वार जियें. जितना आप दूसरों की बात मानेंगे वो
उतना ही आपके हर फ़ैसले में दख़ल देंगे. सच ही है सुनने वाले
जितना सुन कर मानेंगे उतना ही कहने वाले कहेंगे. कमाल कहने
वालों का नहीं सुनने वालों का होता है.


सुनने वालों का कमाल है
कहने वाले तो बहोत कहते हैं

ठहरे हुए पानी सा रिवाज़ है
मुझे ये तरक्की-पसंद कहते हैं

समझो जो ख़ामोशी में हैं
मायने अल्फ़ाज़ के तो बहोत होते हैं

दिल के अरमानों का कमाल है
वहम पर यक़ीन करने को कहते हैं

जहाँवाले यूँ मसले आसान करते हैं
कभी भूला नहीं,उसे याद कर कहते हैं

ये पाक़ीज़ा तेरी मोहब्बत का कमाल है
बा-वज़ू हम ख़यालों में तेरे डूबते-उभरते हैं