Ads

Thursday, 13 August 2015

दर-ओ-दीवार

दर –ओ –दीवार

ज़िन्दगी अपने मक़ामात कभी-कभी ख़ुद तय करती है. इन्सान यूँ बेबस होकर सब कुछ देखता ही रह जाता है, कि ये तो ना थी चाह कभी उसकी, ऐसा तो सोचा ना था अंजाम उसने. कोशिशें उसकी अपनी मंज़िल की चाह की सारी दम तौड़ती नज़र आती हैं. नाक़ामी के इस आलम में उसे हर तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देता है. ऐसे हालात में उसके कई साथी भी दामन झटक कर उसे छोड़ जाते हैं. ये दुनिया की रिवायत है इसे नज़र-अंदाज़ करना चाहिए. इन्सान को ख़ुद पर से कभी ऐतमाद को उठने नहीं देना चाहिए. जैसे हर रात के बाद सवेरा है, वीराने के बाद बसेरा है,ऐसे ही हर नाक़ामी के बाद क़ामयाबी खड़ी होती है.मायूसी के आलम में ख़ूबसूरत मौक़ा खोने की ग़लती नहीं करना चाहिए

दर-ओ-दीवार भी ग़ममें  रोते हैं
दिल और आँख जब नम होते हैं
पहरों, पहरा दिया लम्हों ने लेकिन
जज़्बात के साथ दिन-रात भी रोते हैं
क़तरा-क़तरा पिघलता है आसमा 
बादल भी बरस-बरस रोते हैं

लाख जातन करो इन्हें मनाने के
इल्तजा करो न छोड़ कर जाने की 
जाने वाले अश्क़ों, तुम क्या जानो
ज़ार-ज़ार ये दिल भी रोते हैं
छोड़ आँखों का साथ दूर क्यों जाते हैं 
कहते हैं आंसू ग़म में साथ निभाते है
यूँ छोड़ जाना,ये कैसा साथ निभाना है
जाने वाले लम्हा-लम्हा हम भी रोते हैं

आँखों की सदा,ख़ामौशियों की आवाज़
सन्नाटों के शोर में गुम  सारे हज़रात
हालात समझने लगते हैं तो रोते हैं

बहते अश्क़ आते सभी को नज़र
जज़्ब होते जो आँखों ही आँखों में
जान न पाता,कोई पहचान न पाता
ख़ून के आंसू जब-जब रोते हैं

शब् मुस्कुराती या सिसकती सुबह 
अंधेरों से मिल ये उजाले रोते हैं

मरती है इंसानियत गर जहाँ में
साथ उसके ज़िन्दगी भी मरती है
घायल वक़्त ऐसा इक पंछी
बेबसी पर लम्हे-लम्हे रोते हैं

Friday, 31 July 2015

क़ामयाबी से मेरी ख़तरा है



ज़िन्दगी की जद्दोजहद में इन्सान जब अपनी क़ामयाबी की तरफ़ बढने लगता है ,तब उसके अपने ही कई बार उसे मायूस करने की कौशिश करते हैं. उसे रोकते हैं,मना करते हैं. अक्सर ऐसा घर की बेटियों के साथ हमेशा ही होता है. हर मर्तबा वो गलत नहीं होते . सही रास्ता दिखाने की कौशिश भी होती है उनकी कभी-कभी. पर कुछ वो अपने जिन पर पूरा एतमाद होता है इन्सान को, वही मुश्किलें पैदा करने  लगें तो, हर कोई अपने आप को हारा हुआ सा महसूस करने लगता है. उसे तब सबसे शिक़ायत हो जाती है. उसे लगने लगता है, हर कोई उसे नक़ामयाब ही देखना चाहता है. हर किसी को तब वह शक़ की निगाह से ही देखने लगता है. ये सच है कि हर कोई आपका दोस्त नहीं होता पर हर कोई दुश्मन भी तो नहीं होता. पर ये दिल क्या करे अब तो इसे किसी का भी भरोसा नहीं रहा. पर ज़माने से शिक़ायतें लाख सही अपने रास्ते पर चल कर मंज़िल को पाना ही दुनिया को अपना जवाब देने का सबसे अच्छा और सही तरीक़ा होता है

नाक़ामी मेरी मसला नहीं
क़ामयाबी से मेरी ख़तरा है
दुश्मनों को नहीं
दोस्तों को रास्ता मेरा अखरा है
दर्द की मेरे परवाह नहीं
मुस्कुराहट से मेरी शिकवा है
ख़ुशियों से नहीं
ग़मों से मेरे, दिल सबका बहला है
दोराहों पर शक़ नहीं
ग़लत मोड़ से डरना है
मंज़िल पर बसेरा नहीं
सफर के बाद नए सफ़र पर चलना है
दीवारों का क़सूर नहीं
बंद दरवाजों ने जज़्बा मेरा बदला है
बेबसी से मेरी मतलब नहीं
ख़ुशहाली से मेरी सदमा है
हैवान बनती इस दुनिया में
इन्सान हर दम दहला है
मेरे क़दमो की ज़मीन छीनने में
मेरा अपना ही कोई पहला है
उलझनों से मेरी क्या है वास्ता
इत्मिनान से मेरे आज
दिल अपनों के क़तरा-क़तरा हैं
पल-पल कटती लाशें मसला नहीं
मज़हब के नाम पर बेमज़ह्बों का पहरा है

Thursday, 9 July 2015

ख़त अधूरा सा कोई


बाज़ दफ़ा ज़िन्दगी आपको कुछ ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देती है कि आप मौजूदा दौर में खड़े हो कर माज़ी की ख़ुशनुमा यादों से सराबोर हो कर रह जाते हैं. उन लम्हों को जैसे दोबारा जीने लगते हैं. ये एक ऐसा पल होता है जब आपकी नज़रों के सामने सब कुछ तैरता हुआ सा गुज़रने लगता है. आपकी परवाज़ आपसे कहती है, थोड़ा रुको,थोड़ा सा थमो. इस तेज़ चलती ज़िन्दगी में ऐसे पल जो सुकून, जो ख़ुशी दे कर जाते हैं उन्हें बयाँ करना जैसे नामुमकिन सा होता है. कुछ भूले-बिसरे ख़्वाब, कुछ बिछड़ी सी यादें , आपका ज़हन उनके सिरे जोड़ने लगता है. सारी क़ायनात जैसे थमी सी लगती है.ऐसी पुरनूर रौशनी में घिर जाता है इन्सान कि उसके आर-पार कुछ दिखाई नहीं देता. ऐसे लम्हात ज़िन्दगी को एक नई ताक़त, एक नया जोश दे जाते हैं, और इन्सान हल्का सा महसूस करने लगता है, जैसे हवाओं में उड़ने सा लगता है, जैसे आसमानों पर चलने लगता है.

ख़त अधूरा सा कोई ,या हो अधूरा ख़्वाब
ज़िन्दगी में यक-ब-यक आ जाते हैं याद
आ जाते हैं हमें दिलाने कुछ अधूरी याद 

उम्मीदों से भरकर,जज़्बातों से हो कर लबरेज़
चाहा था इन्हें,और चाहा था,करना इन्हें मुक़म्मल 

चाहा था कभी जीना इनके साथ, हर वो लम्हात
सोचा था करना साथ इनके हवाओं में परवाज़

आज पूछते हैं ये सवालात ऐसे एहसासात के साथ
है शामिल शिक़ायत भी, शिक़वा भी है थोड़ा साथ
कुछ रूठे से ये हैं हमसे, एक ख़ुमारी भी है साथ

सोचने लगे हम भी क्या ग़फ़लत की थी बात
कब इन्हें भूले हम, कहाँ छूटा इनका साथ

याद कर धड़कनों में भी रवानी आई
कुछ थोड़ रुक-थम सा जाने के बाद
ठंडी एक साँस गुज़री सीने के पार

ये तो मंज़िल इनकी ना सोची थी जो है आज
क्या ये मुमकिन है, इन्साफ़ अब हो इनके साथ

अधूरे ही सही गुज़रते हैं जब भी ज़हन में आज
वजूद की अपने देते गवाही यक़ीन भी होता साथ

ये अधूरे ख़त या हों आधे ख़्वाब या आधे जज़्बात

छोड़ जाते हैं ख़ला में साथ हमारे बस एक काश!


Thursday, 25 June 2015

ग़ालिब ढूंढते रहे जगह...

कभी कहीं ख़ुदा मिले

ज़िन्दगी में इन्सान इतनी ख़्वाहिशों और हसरतों में घिर जाता है कि ज़रूरतों और ख़्वाहिशों का एक जाल सा उसके इर्द-गिर्द बन जाता है. वह ना तो उस जाल को पार कर पाता है और ना ही उसका कोई सिरा ही ढूंढ पाता है. फिर उलझनों का एक लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है. ग़लती उसकी ख़ुद की होती है, और वह ख़ुदा से शिक़ायतें करने बैठ जाता है. शिक़ायतों की भी एक लम्बी सी फ़हरीस्त होती है. शिक़ायतनामा लेकर वह तमाम ख़्वाहिशों, ज़रूरतों और उलझनों को दूर करने की दुआ मांगता है. अपनी ख़ुद की कौशिशों की कमी नहीं देखता, ना ही देखना चाहता है, यहाँ तक कि इबादत में भी.खैरात ही में सब कुछ पाना चाहता है ना तो ख़ुदा ने जो कुछ दिया है उसका शुकर अदा करता है कभी ना ख़ुदा के बताये सही रास्ते अख्तियार करता है कभी.

ग़ालिब ढूंडते रहे पीने को जगह जहाँ ख़ुदा ना हो
ढूंढते हैं हम भी दर-ब-दर कभी कहीं ख़ुदा मिले

सबकी अपनी ज़रूरतें अपनी हैं ख़्वाहिशें
चाहा हम भी ख़्वाहिशों से रू-ब-रू मिलें

जाने बिना मान कर क्या ख़ुदा मिला?
मान लेने भर से भी कहाँ ख़ुदा मिला

अपनी इबादत की लौ कर रौशन इस तरह
अपने नक्श-ऐ-क़दम बना कुछ इस तरह
फिर तुझे ख़ुदा ही ख़ुदा मिले जहाँ मिले

मुस्कुराहट को कैसे दरजा मिला शहादत का
हँसी की कब्र पर चढ़े फूल, ख़ुशी मिली कब?
हमें तो जब मिले सारे दर्द के नश्तर मिले

रास्तों को खोजते रहे मंज़िलों को ढूंडते रहे
मंज़िलों ने साथ छोड़ा जहाँ डगर नहीं मिले

कारवाँ बढ़ता रहा आगे रास्ते छूटते रहे पीछे
चाहा तो हमने भी कभी कहीं मंज़िलों से मिलें

ज़मी के पत्थर ने क़िस्मत कैसी-कैसी पाई
मूरत बन मंदिर में लगा ताज में जड़ा कोई
पत्थर कई ठोकरों में हमें दर-ब-दर मिले

Friday, 12 June 2015

bat agar chhedi to door tak jayegi..



Bat Agar Chhedi  To Door Tak Jayegi


ज़िन्दगी जब अपनी रफ़्तार से गुज़रती है ,तब कभी-कभी ऐसे लम्हे भी आ जाते हैं जब कुछ बातों का,कुछ पलों का आपसे अमना-सामना हो जाता है .तब आप चाहते तो हैं कि उनसब का हिसाब-किताब कर लिया जाये, जबकि आप ये भी जानते हैं कि उससे थोड़ा फ़ायदा पर नुक़सान ज्यादा होने वाला है. जो बीत गया उसे बीत ही जाने दिया जाये तो ही ज़्यादा बेहतर होता है. उसे आज बदला नहीं जा सकता है. आप जी चुके हैं जिसे, उसे क्योंदोहरा कर उस दर्द से दोबारा गुज़रने की कौशिश करना चाह रहे हैं. कभी भी चेहरा पीछे करके नहीं चला जा सकता. आगे बढने के लिए आगे ही देख कर सही चला जा सकता है. पुराना अच्छा हो या बुरा उसे उस पल ही छोड़ कर आगे बढ़ जाना चाहिए जब वो गुज़र गया. पुराना हिसाब-किताब इंसानी रिश्तों में एहमियत नहीं रखता. ये कोई मुनीम का पैसों का खता नहीं है, जिससे आपको ज़्यादा मिलने की गुंजाईश हो. इसमें खोने की ज़्यादा गुंजाईश होती है. और सबसे ज़्यादा वक़्त ही खोते हैं आप और हम इस उधेड़-बुन में. कई मर्तबा रिश्ते भी खो देते हैं. कभी-कभी ज़िन्दगी ख़ुशग़वार तरीक़े से जीने के बेहतरीन मौक़े भी चूक जाते हैं. इसलिए कहते हैं, बात छेड़ी तो दूर तक जाएगी.मुश्किल हालात पैदा करे ऐसी वजह को ख़त्म करने में ही समझदारी और भलाई दोनों है.

बात अगर छेड़ी तो दूर तक जाएगी
दफ़न इसे कर ज़िन्दगी आसन हो जाएगी 

शिकवों से क्या हासिल,शिक़ायतों से नतीजा क्या
वक़्त रेत सा फ़िसल चुका, फ़रियाद से फ़ायदा क्या

ज़माने की तलख़ियां जब माएने रखेंगी तेरे लिए
डर, बुझी चिंगारी को हवा देने से आग़ लग जाएगी

मंज़िल पा कर ही ज़िन्दगी क्या मुक़ाम पाएगी
मंज़िल के आस-पास ही चैन से गुज़र जाएगी

कश्मकश में ना उलझ, दुश्मनों से यूँ ना मिल
वरना तो रही सही दोस्ती भी हवा हो जाएगी

देती है यूँ तो हवा चिराग़ को ज़िन्दगी भरपूर
इसे छेड़ा तो चिराग़ को बुझा भी यही जाएगी

कहे-अनकहे लफ़्ज़, कुछ सुने-अनसुने अल्फ़ाज़
याद करते-करते उम्र ख़ुशनुमा गुज़र जाएगी

ख़्वाबों में तैरते हैं रंगीन साए माज़ी के आज
अब तो आँखों-आँखों में सारी रात गुज़र जाएगी

Thursday, 4 June 2015

dekh kar jinhe fakhr bhari mujhe muskan de

देख कर जिन्हें एक फ़ख़र भरी मुझे मुस्कान दे


ज़िन्दगी में सभी को अपने छोटे-छोटे मुक़ाम तय कर लेना चाहिए. एक मुक़ाम हासिल करने के बाद दूसरे मुक़ाम के लिए कौशिश शुरू कर देना चाहिए. बे-वजह वहीँ थम कर नहीं रह जाना चाहिए. कभी छोटी-मोटी मुश्किलों से कभी घबराना नहीं चाहीये, और ना ही उनसे पार पाने के लिए कोई ग़लत रास्ता अख़्तयार करना चाहिए. ख़ुद पर फ़ख्र और ग़रुर कर सके ऐसे काम करना चाहिए. ऐसा नहीं कि बहोत बड़ी क़ामयाबी ही फ़ख़र दिला सकती है. छोटे-छोटे कम दूरी के माइलस्टोन की क़ामयाबी भी वही एहसास और सुकून, साथ में ख़ुशी दिलाएगी जो कोई बड़ी क़ामयाबी दिलाती है. अगर रास्ता सही हो और ख़ुद की क़ाबलियत पर एतमाद हो, तो जीत आपकी ही होगी. छोटी-मोटी ग़लतियों को, छोटी-मोटी नाकामयाबियों को नज़र-अंदाज़ करें ज़रूर पर साथ-साथ उनसे सीखते भी जाएँ .ग़लतियों के डर से जब तक कौशिश ही नहीं करेंगे, तो कोई शुरुआत ही नहीं होगी, और कोई शुरुआत नहीं होगी तब किसी मंज़िल, किसी मुक़ाम को कैसे पाएंगे? इसलिए नई शुरुआत करें ज़रूर. साथ-साथ हर क़ामयाबी का जश्न मनाते जाएँ. छोटी हो या बड़ी क़ामयाबी तो क़ामयाबी होती है.

ऐ, वक़्त मुझे सबर नहीं, बेसब्री दे

मुझे क़रार नही अभी तू बेक़रारी दे

मंज़िल पर पहुँचते ही, नए मक़सद की तैयारी दे

रुक कर पीछे रंज से ना देखूं कभी

ख़ुद पर शर्मिन्दगी मिले किसी हालात में

ऐसे कभी ज़िन्दगी में लम्हात ना दे

ज़िन्दगी के रास्तों में जो मुक़ाम हों

उन पर मैरे क़दमों के ऐसे निशान हों

देख कर जिन्हें फ़ख़र भरी मुझे मुस्कान दें

ऐ,वक़्त मुझे सबर नहीं, बेसब्री दे

बहोत ख़ास नहीं मैं बस आम रहूँ

किसी के कुछ काम मैं आ सकूँ

ख़्वाबों भरी आँखों को हक़ीक़त से मिला सकूँ

ऐसे मक़सद के मुझे निशानात दे

ऐ,वक़्त मुझे सबर नहीं बेसब्री दे

रास्ते आकर मुझ तक कभी ख़त्म ना हों

रास्तों से कभी पीछे मैं ना रहूँ

ना तो मै भूलूँ कभी रास्तों को

ना रास्ते मुझे गुज़रा हुआ कहें

फ़ुरसत नहीं मुझे तो मसरुफ़ियत दे

मंज़िल पर पहुचते ही नई मंज़िल का मुझे पता दे

किसी की दुआ में बसने का मुझे तू हुनर दे

किसी को सुकून दे सके ऐसा मुझे तू साया दे

मंज़िल पर पहुँचते ही नए मक़सद की मुझे तैयारी दे

ऐ,वक़्त मुझे सबर नहीं बेसब्री दे



Sunday, 10 May 2015

बड़ी बे-तरतीब है बिखरी है ज़िन्दगी




इन्सान को इस जहाँ में ख़ुदा ने पूरी तरह मुक़म्मल बना कर नहीं भेजा है. उसे सब यहीं इस जहाँ में ही सीखना है. इसलिए ग़लतियां होती हैं तो, घबराना नहीं चाहिए. अपनी ग़लतियों से सीख कर सबक़ ले कर आगे बढ़ते रहना चाहिए. उसे ख़ुद को पहचानना ज़रूरी है. अपनी क़ाबलियत को परखते रहना चाहिए. ज़िन्दगी में कुछ पल अपने आप के लिए भी निकलना चाहिए. ऐसे पल जब वह ख़ुद की पहचान अपने आप से कराए. सिर्फ़ अपने दिल की बात जाने. अपने लिए और अपनी ख़ुशी के लिए कुछ करे. ऐसा ना हो कि दूसरों की ख़ुशी की ख़ातिर अपने आपको बदलते-बदलते वह ख़ुद अपने आप के लिए अजनबी बन कर रह जाए. सबकी ख़ुशी का ख़याल रखे ठीक और सही बात है, पर अपनी ख़ुशी के लिए भी तो उसका कोई फ़र्ज़ बनता है ना! चाहे थोड़ी मुश्किल आए ,पर कौशिश करने वालों की हार नहीं होती. 


ख़यालों को सजाना नहीं आया
लफ़्ज़ों को तरतीब से जमाना नहीं आया
बड़ी बेतरतीब है बिखरी है ज़िन्दगी
छाँव ही नहीं घनी सी ये ज़िन्दगी
धूप की तपन भी है ये ज़िन्दगी
रहती एक छाँव की धूप में सदा तलाश
बहकने लगते हैं यूँ ही कभी अल्फ़ाज़
अरमानों की बेतरतीब चाल के साथ
इस रौशनी का कर लें क़ुबूल साथ
या चलें कुछ क़दम अँधेरे के  साथ
यूँ तो रंग बिखेर देगी रौशनी आज
अँधेरा लेकिन मुश्किलों में भी देगा साथ
रौशनी में जो बहाए अश्क़
ज़माने भर को देगी ये बता
अँधेरा लेकिन अश्क़ सारे,
दामन में अपने लेगा छुपा
जो है अपना वो सच में अपना नहीं
दुश्मन हो कर भी दुश्मन ग़ैर नहीं
शाम की धुन्द्लाहट हो
या हो रात का अँधेरा
जो है पास उसे थाम लो
रफ़्तार से चलते जाना है ज़िन्दगी
दुनिया-ऐ महफ़िल में बेचैनियाँ, बेताबियाँ
मिल ही जाती हैं अक्सर यहाँ ये ख़ामियाँ
रहती हैं ख़ामोशियाँ भी तनहाइयाँ भी
ख़ामोशी के शोर को सुन ना सका कोई
भीगे लफ़्जों में भीगा ना कोई
आहट सुन दर्द की जाते बारी-बारी दूर सभी
सच हैं खुशियों में मेलें होते हैं
ग़म में सब अकेले होते हैं
पहचान होती अपनों-ग़ैरों की मुश्किल में
सबक़ पा कर अब क्या हासिल
सागर में तलाशो ना मीठा पानी
अपना सा उसे बनाने में
नदियों ने खो दी सारी ज़िन्दगानी